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Friday, 6 May 2016

चित्त की सुनो रे मनवा

चित्त की  सुनो रे मनवा
 चित्त की  सुनो
 बाहर घोर अंध्काल
 संभल कर चलो …
राह् कई है, अनजानी सी
 देख् पग धरो, रे मनवा
 चित्त की  सुनो…
अज्ञान- के कारे बादल
 गरजे बरसें बिन कोई मौसम
 आपने मन की  लौ को जगा कर
 रखना तू हर पल
 रे मनवा ,चित्त की  सुनो…
ऐसे चित्त का चित्त रमाये ध्यान करे  हरि का
 भव्सागर पार हो जाए
 कलयुग में
 जगा कर रोम रोम और प्राण
 रे मनवा ,
चित्त की सुनो हर बार

चित्त की सुनो


अपने अपने हिस्से का आसमान

 
वो नीला आसमान ,
कुछ तेरा , कुछ मेरा
 बाँट लिया आपस में
 हमने अपने हिस्से का आसमान
 कई रंग के ख्वाब यहाँ …
जीने के हजारों मक़ाम…

तेरी जेब में दुनिया को खरीदने का सारा सामान
 मैंने भी जोड़े चंद सिक्के ,
अपनाने कुछ ऐश ओ आराम ..
पर वो शक़्स रहता जो
 खुले आसमान के तले
 ना जुटा पाया कुछ सामान
 ना पहचाने दुनिया उसे ,
ना अपनाये अपनों में कहाँ

छीन गयी जिसकी
 एक बिघा ज़मीन
 ढोये वो बोझ, गैरों का यहाँ …
वो राह् पर भूकाबैठा …
तू चटकारे लगाये यहाँ …
क्या खूब जिया तू इनसान
 कैसा यह फ़ासला …
इनसान …तू
 इनसान से जुदा यहाँ !
उस अनपढ़ , के हाथों
 ना दी किसी ने एक
 कलम और किताब
 छीन लिया बचपन
 थमा दी लाठी
 दूर् कर
 भेद कर
 अलग कर
 इनसान को ,
इनसान से यहाँ…
बस
 बाँट लिया आपस में हमने
 अपने अपने हिस्से का आसमान !
****   आज कि येह घटना जब आज छेमिस्त्र्य के पेपर कुवछ एसा ओब्सेर्ब किआ जेसे कि ये  गिर्ल्स भि कित्नइ मत्लबि होति हन .......और उस समय दोस्ताना भि कोइ ७ नहि देता ? उस्को यदि खुद कुछ आता हो
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